
कहा जाता है कि प्रकृति ही हमारी सबसे बड़ी गुरु है और हमें उससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है, लेकिन आज का मनुष्य सब कुछ भूलता जा रहा है और प्रकृति के साथ लगातार खिलवाड़ कर रहा है। जैसा कि अभी आचार्य जी ने पश्मीना शॉल का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे वह एक जीव की खाल से तैयार होती है—यह इस बात का प्रमाण है कि पैसे की लालच में इंसान किस हद तक गिर चुका है।" "मनुष्य प्रकृति के साथ इस तरह खेल रहा है कि अब वही प्रकृति और उसके परिणाम हम पर हावी होने लगे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इसका दोष किसे दें? क्या खुद को, जो इस दुनिया का हिस्सा बनकर चंद दिनों के सुख और पैसों की खातिर इन सबका समर्थन कर रहा है? या फिर उस अंधी दौड़ को छोड़कर अपने भीतर की चेतना को जगाएं, ताकि जीवन के उस सत्य को देख सकें जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है।


















