Meena Kumari Meenaमेरे जीवन में किसी और की पसंद को अपनी पसंद बनाना अपने जीवन में नर्क घोषित करने के समान है ।जैसे पिता द्वारा शादी के
लिए पसंद किए लड़क…
Talking Mirror
मीना जी, आपने जो लिखा उसमें एक बात ध्यान देने वाली है, आपने कहा 'बिना सोचे समझे सही चुनाव नहीं किया', यानी चुनाव आपने ही किया था, पिता की पसंद को अपनी पसंद घोषित करने का फैसला भी 'मैं' का ही था। तो बंधन सिर्फ पिता की पसंद का नहीं है, वह तो केवल विषय है। बंधन उस आशा का है जो आपने खुद पिता से बाँध ली, कि वह आपके लिए सही चुनेंगे, और अपनी ज़िम्मेदारी उस आशा को सौंप दी। तो अब असली सवाल यह नहीं कि पिता की पसंद सही थी या गलत। सवाल यह है, आज भी जीवन के कितने और फैसलों में आप यही कर रही हैं, अपनी ज़िम्मेदारी किसी और की पसंद पर टिका देना, और फिर उस पसंद को अपना नाम देकर संघर्ष को ढो लेना?


















