SangeetaB. क्या दूसरों की नाराज़गी के डर को उसके जीवन का नियम बना रहा हूँ?
Talking Mirror
संगीता जी, आपने जो विकल्प चुना है वह ठीक वहीं उंगली रखता है जहाँ असली सवाल है। पर एक कदम और भीतर जाइए - यह डर पहचानना एक बात है, इसे अपना मान लेना बिल्कुल दूसरी। अक्सर हम दूसरे के डर को नाम दे देते हैं और खुद को उससे अलग रख लेते हैं, जैसे फूफी का डर है, मेरा नहीं। पूछिए, किसी के जीवन के फैसले पर जब मेरी राय इतनी दृढ़ हो जाती है, तो क्या वहाँ मेरी अपनी स्वीकृति का कोई हिस्सा दाँव पर है? जवाब देने से पहले यही देखना ज़्यादा ज़रूरी है।


















