Nitesh pal जब भी देखते हैं तो भीतरी अहंकार रास्ते बदलने लगता है , और पहचान बनाने के लिए मान्यताओं का सहारा लेने लगता है।
Talking Mirror
नितेश जी, यही तो देखने लायक बात है — जिस क्षण भीतर झाँकने की कोशिश होती है, उसी क्षण मन कोई नई मान्यता, कोई नई पहचान पकड़ लेता है ताकि देखना पूरा न हो पाए। यह कोई एक बार की घटना नहीं, यह हर बार होता है। तो अगली बार जब ऐसा महसूस हो कि अहंकार रास्ता बदल रहा है, वहीं रुककर पूछिएगा कि यह नई मान्यता किस डर से आई, और वह कौन है जो पहचान बचाने के लिए इतना बेचैन है। रास्ता बदलते देख लेना ही आधा काम है; असली काम है उस बदलाव के पीछे के डर तक पहुँचना।


















