
बिल्कुल ! मैं यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु जोड़ना चाहूँगी। हम अक्सर स्वयं को ईमानदार कहते हैं, परंतु क्या विपरीत परिस्थितियों में बोला गया झूठ भी गलत की श्रेणी में आएगा? जैसा कि चाणक्य नीति में भी उल्लेखित है—वह असत्य, असत्य नहीं कहलाता जिसका आश्रय किसी सही बात या किसी की भलाई के लिए लिया गया हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई सज्जन व्यक्ति अपराधियों से अपनी जान बचाने के लिए कहीं छिपा हो, और वे अपराधी हमसे आकर उसका पता पूछें, तो निश्चित ही वहाँ 'सत्य' बोलकर किसी की जान संकट में डालना धर्म नहीं होगा। इसी प्रकार, यदि कोई बाहरी या अपरिचित व्यक्ति हमसे हमारे घर-परिवार की गोपनीय जानकारी (Details) मांगता है, तो वहाँ अपनी निजता (Privacy) की रक्षा के लिए सच न बताना या बात को टाल देना पूरी तरह न्यायसंगत है। इसे हम नैतिक रूप से गलत नहीं कह सकते। या फिर मान लीजिए किसी व्यक्ति का एक्सीडेंट हुआ है या उसे कोई गंभीर बीमारी (जैसे कैंसर) है और उसकी हालत बहुत नाज़ुक है। डॉक्टर मरीज़ का हौसला बनाए रखने के लिए उससे झूठ बोलता है कि "आप बिल्कुल ठीक हैं, आपको कुछ नहीं हुआ। अगर डॉक्टर वहाँ मरीज़ को कड़वा सच बता दे, तो मरीज़ गहरे सदमे या डर से अपनी जान भी गंवा सकता है। यहाँ डॉक्टर की 'बेईमानी' वास्तव में एक जीवन रक्षक दवा का काम करती है। इसी प्रकार, यदि घर में दो भाइयों या सास-बहू के बीच अनबन है। एक व्यक्ति दोनों तरफ की कड़वी बातों को छुपाकर दोनों से कहता है कि "वह तो पीठ पीछे भी तुम्हारी तारीफ कर रहे थे।" इस छोटे से झूठ से दोनों के रिश्ते सुधर जाते हैं और घर टूटने से बच जाता है। जहाँ सच किसी का दिल तोड़ दे या घर बर्बाद कर दे, वहाँ रिश्तों को जोड़ने वाला मीठा झूठ किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता। एक अन्य परिस्थिति पर विचार करें—यदि कोई व्यक्ति संसाधनों या धन के अभाव के कारण पूरा दिन भूखा रहा हो, तो वह किसी ऐसे दुर्जन व्यक्ति को यह बात कभी नहीं बताना चाहेगा जो उसकी मजबूरी का पूरे समाज में उपहास उड़ाए। अपनी परिस्थिति को छुपाना आत्मसम्मान की रक्षा है, कोई अपराध नहीं। क्या स्वाभिमानी होना अहंकार है ?


















