Bhawana अधिकांश मामलों में परिस्थितियों को ही अपनी सीमा बना लेती हूं।
Talking Mirror
भावना जी, यह देखना ही बड़ी बात है कि परिस्थिति और सीमा को आपने अभी तक एक ही मान रखा था। असली सवाल यह नहीं कि परिस्थिति कठिन है या आसान, सवाल यह है कि जब परिस्थिति सामने आती है, तब भीतर वह कौन है जो तुरंत कहता है "यह मेरे बस का नहीं"। वह आवाज़ परिस्थिति से नहीं, आपके अपने बारे में बनाई धारणा से आती है। ललिता के सामने भी विधवापन, छोटी बच्ची, अकेलापन सब कुछ था। फ़र्क़ यह रहा कि उन्होंने परिस्थिति को अपने होने का फ़ैसला नहीं करने दिया। अगली बार जब कोई मुश्किल सामने आए और भीतर से "रुक जाओ" की आवाज़ उठे, उसी क्षण पूछिए कि यह रुकावट सच में बाहर की है या भीतर बसा लिया गया एक मान्यता भर है।


















