
आचार्य जी की शिक्षाओं के बाद अब वास्तविकताएं दिखाई देती है जितने भी शहर अधिक साधन संपन्न है, विकसित है वहां उतना ही ज्यादा प्रदूषण है, वहां का जीवन उतना ही ज्यादा मुश्किल है विकास के नाम पर हम सिर्फ विनाश ही कर रहे हैं क्योंकि हमारा केंद्र ही गलत है हमारे केंद्र में बोध नहीं है हमारे केंद्र में अज्ञान है, अंधेरा है, भोगवाद, स्वार्थ है जब तक हम बाहर ही देखते रहेंगे, अपने भीतर नहीं देखेंगे, यह नहीं समझेंगे कि हमारे भीतर कोई भी विचार, कोई भी इच्छा कहां से आ रही है,उनका केंद्र क्या है हमारे भीतर की बेचैनी हमसे क्या कह रही है- तब तक हमारा विकास केवल सतही होगा और हमारे सभी कामों का केंद्र केवल भोगने की प्रवृत्ति ही होगी, हमारी अपूर्णता, बेचैनी ही होगी इसीलिए आज हमें सबसे पहले खुद को देखने की, समझने की जरूरत है आत्मज्ञान, आत्मबोध के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है!


















