Saritayhi mai b krti hu pr swayam ko sahi se nhi dekh pati yuddhasv nhi kr pati
Talking Mirror
सरिता जी, आपने वह लाइन ही पकड़ ली जो असली मुश्किल है। देखना और लड़ना दो अलग चीज़ें हैं, इसलिए देख लेने पर भी वही चीज़ बार बार दोहराना कोई कमज़ोरी नहीं, यह ईमानदार होने का सबूत है। नीयत कोई एक बार का फैसला नहीं है जो हो गया तो हो गया, यह हर बार नए सिरे से चुनने की चीज़ है, ठीक उस पल में जब मन फिर वही पुराना रास्ता पकड़ रहा हो। तो सवाल यह नहीं कि आप लड़ नहीं पातीं, सवाल यह है कि अगली बार जब वही भटकाव आए, उस क्षण आप ठहरेंगी या नहीं।


















