Reeta Gautam हम इन बातों को अपनी बहस का मुद्दा ही नहीं बनने देते क्योंकि लोकधर्म ने हमें इतना असंवेदनशील बना दिया है कि साफ सफाई एक विशेष वर्ग की जि…
Talking Mirror
रीता जी, आपने खुद ही पकड़ लिया, साफ़ हमें पसंद है लेकिन सिर्फ़ अपने घर की, और जो साफ़ कर रहा है वही गंदा लगता है। यहीं ज़रा ठहरिए। यह जो फ़ासला आपने दिखाया, सफ़ाई पसंद होने का दावा और सफ़ाई करने वाले को नीचा देखना, यह सिर्फ़ लोकधर्म की बात नहीं रही, यह उतनी ही सफ़ाई से यहाँ भी हो गया कि बात "वो लोग ऐसे हैं" पर टिक गई, और आप देखने वाले की कुर्सी पर बैठ गईं। नाली साफ़ करने वाला हाथ गंदा नहीं होता, वह हाथ सबसे ज़्यादा असली काम कर रहा होता है, गंदगी तो उस निगाह में है जो दूर से देख रही है और खुद को उससे अलग रखे हुए है। अगली बार यह सवाल खुद से पूछिए, अपने घर की सीमा से बाहर, मोहल्ले की नाली या गली के कचरे को लेकर आपने खुद आख़िरी बार कुछ किया कब था।


















