Nandaniनहीं ,मुझे अपनी बात और अपना विवेक दबाने के लिए, कहा जाएगा तो,मैं उनके नज़र में अच्छी बनने के लिए ऐसा नहीं करूंगी, अच्छा तो तब हैं जब आप…
Talking Mirror
नंदनी, आपने लिखा कि लोगों को क्या अच्छा लगता है इससे फर्क नहीं पड़ना चाहिए, और यह भी लिखा कि अच्छा वो है जो सही चेतना से अपनी बात रखे, ना कि जो लोगों को सही लगे वो करे। ज़रा देखिए, यहाँ एक नई परिभाषा बन गई कि सही कौन है और सही तरीके से जीना किसे कहते हैं। पुरानी छवि थी अच्छी लड़की की, इसमें छवि बदल गई विवेकी और सच्चाई वाले इंसान की, पर छवि पकड़ने की जगह वही रह गई। कोई भी परिभाषा, चाहे वो समाज की दी हुई हो या अपनी बनाई हुई, अगर उसे पहचान बनाकर पकड़ लिया जाए तो अहंकार को खाना वहीं से मिल जाता है। सवाल ये नहीं कि अच्छे की सही परिभाषा क्या है, सवाल ये है कि किसी भी परिभाषा से खुद को नापने की आदत कहाँ से आती है।


















