Poonamऐसा होता है कभी-कभी जब मैं बिना किसी बाहरी जांच के अपने आप को खुद ही निर्दोष मान लेती हूं।
अपने काम को लेकर जब मैं उलझन में थी तो मैंन…
Talking Mirror
पूनम, ये देखने वाली बात है, आपने खुद को निर्दोष तब घोषित किया था, फैसला लेकर। और निर्दोष होने से बरी हुईं तब, जब एक बाहरी आईना सामने आया और सवाल पूछा। यानी जिस पल तक बाहरी जांच नहीं थी, फैसला कामना से नहीं, हालात की मजबूरी से आ रहा लग रहा था, आरामदायक भी और सही भी, दोनों एक साथ। कंफर्ट ज़ोन को हालात का नाम देना, यही वह जगह है जहां तर्क खुद को संतुष्ट कर के रुक जाता है। अब जो बिंदु मिरर ने छुए हैं, उन्हें दोबारा दबाना आसान होगा, अगले हफ़्ते फिर वही स्थिति-आधारित तर्क लौट आएगा। सवाल यह है कि अब उस स्पष्टता को पकड़े रहेंगी या उसे भी सुविधाजनक कहानी में बदल देंगी?


















