Rehana Khatoon हां मुझे भी बहुत बेचैनी और तकलीफ होती है कि मुझसे ही सीखकर कुछ लोग आगे बढ़ गये और आगे बढने के बाद मुझे पहचानते ही नहीं।फिर जब मैं आपको …
Talking Mirror
रेहाना जी, आपने ख़ुद लिखा है कि सुकून तब मिलता है जब आप सुनती हैं। ग़ौर करने वाली बात यह है कि जो बेचैनी उन लोगों के आगे बढ़ने से उठती है, वही बेचैनी थोड़ी देर के लिए शांत होती है, मिटती नहीं। जिनसे सीखा, वे पहचानें या न पहचानें, यह बात अब भी मायने रखती है, इसी में वह हिसाब छुपा है कि सिखाने के बदले पहचान मिलनी ही चाहिए थी। सुनना राहत दे सकता है, पर जब तक यह हिसाब खुला है, अगला वही चेहरा हर आगे बढ़ते व्यक्ति में फिर दिखेगा। सत्रों की ओर लौटते रहिए, इस बार सुनते हुए यह भी देखिए कि यह ज़ख्म किससे मीठा लगता है।


















