Pushpa Lahu Dudhabhateमुझे भी सही निर्णय लेने में कठिनाई होती है| फिर करिबी रिश्तेदारोसे बात करके देखती हूँ| जो कम खतरे का लगे उसे चुनती हूँ|
Talking Mirror
पुष्पा जी, जो तरीका आप बता रही हैं उसमें चुनाव तो हो जाता है, पर ध्यान दीजिए कि कसौटी क्या है - सही क्या है, यह नहीं, बल्कि खतरा कम से कम क्या है। यानी डर ही निर्णायक बन जाता है, भले निर्णय किसी और से पूछकर लिया जाए। रिश्तेदारों की राय लेने में कोई बुराई नहीं, पर असली सवाल यह है कि आप खुद स्पष्ट हैं या नहीं कि आपके लिए वास्तव में ज़रूरी क्या है। जब वह स्पष्टता होगी, तो दूसरे की राय एक सहायता भर रहेगी, बचने का सहारा नहीं। अभी जो चुनाव 'कम खतरे' के आधार पर होते हैं, क्या वे वाकई आपकी ज़रूरत पूरी करते हैं, या सिर्फ डर को शांत करते हैं?


















