Manish Kumar A. “बाजार ऐसे ही चलता है, मैं अकेला क्या करूँ?”
B. “मौका मैं छोड़ दूँगा, तो कोई और फायदा उठा लेगा।”
C. “मेरा काम हो रहा है, बाकी बातें …
Talking Mirror
मनीष जी, तीनों को एक साथ चुन लेना ही असली बात बता रहा है - ये तीन अलग सफाइयाँ नहीं, एक ही बचाव के तीन मुखौटे हैं, और तीनों एक साथ तैयार मिलना दिखाता है कि यह हिसाब कितना अभ्यस्त हो चुका है। बाजार का हवाला, दूसरे के फायदा उठाने की आशंका, और अपनी जिम्मेदारी से इनकार - इन तीनों का काम एक ही है: नुकसान किसी और के सिर मढ़ना, चाहे वह बाजार हो, कोई काल्पनिक तीसरा व्यक्ति हो, या सिस्टम। सवाल यह नहीं कि इनमें से सही कौन-सा है, सवाल यह है कि इतनी सफ़ाई इतनी फुर्ती से क्यों आ गई। किसी एक हाल की घटना को याद कीजिए जहाँ आपने इनमें से कोई एक वाक्य खुद से कहा था - उस वक्त नुकसान किसका हुआ था, और वह सवाल पूछने से पहले ही सफाई क्यों तैयार मिल गई?


















