
जब तक यह बही-खाता खुला रहता है, तब तक अहंकार में शिकायत भी जीवित रहती है। अहंकार अपने दुःख को पकड़े रहता है, क्योंकि वही दुःख उसके लिए इस बात का प्रमाण बन जाता है कि "मेरा हिसाब अभी बाकी है।" इस बही खाते का असर बहुत दूर तक और बहुत समय तक और बहुत लोगों तक जाता है। योगदान देने वाला वरिष्ठ सदस्य परिवार में सभी को अपनी मर्जी से, गुलामों की तरह चलाता है, महिलाओं को ना घर से बाहर निकलने देता है, ना ही नौकरी करने देता है साथ ही यदि किसी कारणवश परिवार के किसी पुरुष की नौकरी चली जाए तो उसे भी दुबारा नौकरी के लिए प्रेरित नहीं करता और फ़िर चाहे वो गलत संगति में पड़कर अपना अहित ही क्यों ना कर ले बाकि सदस्य उस व्यक्ति की बस दिन रात सेवा करते रहें। बाकि लोग यह नहीं सोचते कि वो सिर्फ़ खाना पीना मिलने की कितनी बड़ी कीमत चुका रहे हैं उनके बच्चे भी अपने माता पिता का ऐसा दबा हुआ जीवन देखकर जीवन में आगे बढ़ने की बजाए संघर्ष से बचकर चलते हैं। ज्यादा बड़ी कीमत तो उस एक व्यक्ति के अलावा बाकि सब चुका रहे हैं आज भी, और ऐसी नींव बना दी उस एक वरिष्ठ व्यक्ति ने कि उसका खामियाजा बाकि सब उसकी मृत्यु के बाद भी झेलेंगे। परिवार तो प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूप से झेल ही रहा है समाज को भी परोक्ष रूप से झेलना पड़ता है इससे तो अच्छा था कि "मुफ़्त की रोटी" को ना बोल देते। इसलिए अध्यात्म चाहिए जो गलत को गलत कहने कि हिम्मत के साथ संघर्ष में ही आनन्द है, सिखाता है।


















