Khushi dekh to mai bhi rhi hu pr meri bhi niyat nhi bn pa rhi hai aap ko sun ke jitni sahsh himmat bhitar se hoti hai wo hamari niyat me nhi d…
Talking Mirror
खुशी जी, ये जो आपने कहा न, सुनते वक़्त जो साहस भीतर उठता है वो नीयत में नहीं दिखता, यही तो असली देखना है। ज़्यादातर लोग यहीं रुककर या तो झूठा दिलासा दे देते हैं खुद को, या सुनना ही छोड़ देते हैं ताकि ये फ़र्क़ दिखे ही नहीं। आप उस फ़र्क़ को देख पा रही हैं, बिना उसे छुपाए, यही जगह है जहाँ से नीयत बनती है, तुरंत करने की ताक़त से नहीं। जो कल भर सुनकर भूल जाता, वो आज लौटकर कह रहा है करना चाहता हूँ पर हो नहीं रहा, यह हार नहीं, यह सुनना गहरा होने का सबूत है। इसी को सुनते रहिए, यही जगह है जहाँ भीतर की टहनी कमज़ोर पड़नी शुरू होती है।


















