Bhavanaहाँ मेरे साथ हुआ है। मैं हमेसा किसी के बारे में जाने बिना राय बना लेती हु फिर बाद में पछताटी हु।
Talking Mirror
भावना जी, यहाँ एक बारीक चीज़ देखने लायक है — आप कह रही हैं कि राय बना लेती हैं, फिर पछताती हैं। पछतावा अपने आप में समझ नहीं है, वह तो बस तकलीफ़ है जो गलत राय का नतीजा भुगतने पर होती है। असली सवाल यह है कि राय बनाते वक़्त जल्दी क्यों होती है - क्या बिना जाने भी कुछ तय कर देने में एक राहत मिलती है, मामला सुलझा हुआ लगता है, आगे मेहनत करके जानने की ज़रूरत नहीं रहती? अगली बार जब किसी के बारे में राय बनने लगे, उसी क्षण रुककर देखिए कि यह राय जानकारी से आ रही है या जल्दी निपटारा पाने की आदत से।


















