
1️⃣ भारत में लड़कियों को खेलों से क्यों हतोत्साहित किया जाता है? लोकधर्म की भूमिका विकसित देशों में खेल = देश का गर्व है। पर भारत में अक्सर लड़की = "घर की इज्जत" मान ली जाती है। इसके पीछे 3 गहरी मान्यताएँ काम करती हैं: A. "शरीर पर नियंत्रण = संस्कार" वाली सोच लोकधर्म में लड़की के शरीर, पहनावे, बालों तक पर नज़र रखी जाती है। "छोटे कपड़े मत पहनो, धूप में मत जाओ, काली हो जाओगी"। खेल में पसीना, मिट्टी, चोट - इसे "असंस्कारी" मान लिया जाता है। उदाहरण: 2023 में विनेश फोगाट, साक्षी मलिक के प्रोटेस्ट के समय सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा ट्रोल उनके "कपड़ों" और "सड़क पर बैठने" को लेकर हुआ था, उनके आरोपों पर नहीं। B. "शादी और घर ही अंतिम लक्ष्य" 14 साल के बाद लड़कियों को "अब खेल से क्या मिलेगा? शादी करनी है" कहकर हटा दिया जाता है। खेल को करियर नहीं, टाइमपास माना जाता है। उदाहरण: गांव में कबड्डी खेलने वाली लड़की को "लड़कों जैसे" कहकर ताने दिए जाते हैं। माता-पिता को डर होता है "कौन शादी करेगा?" C. "नाज़ुकता का मिथक" जैसा तुमने लिखा - "छुईमुई" वाली सोच। पीरियड्स, चोट, धूप को बहाना बनाकर रोक दिया जाता है। जबकि ली मेइज़ेन जैसी एथलीट पीरियड्स में भी 42km दौड़ती हैं। उदाहरण: स्कूल में पीटी के समय लड़कियों को "तुम बैठो, लड़के खेलेंगे" कहना। या फुटबॉल ग्राउंड पर "ये लड़कियों का खेल नहीं है"। लोकधर्म की भूमिका: लोकधर्म यानी "लोग क्या कहेंगे"। पंचायत, रिश्तेदार, मोहल्ले की आंटी। अगर कोई लड़की बॉक्सिंग या वेटलिफ्टिंग करती है तो पहला सवाल "इसकी शादी कैसे होगी?" होता है। यही डर माता-पिता को लड़की को घर में बैठाने पर मजबूर करता है। जबकि US में 1973 में समान इनाम से माता-पिता को लगा "बेटी से भी नाम और पैसा कमा सकती है"। --- 2️⃣ आचार्य प्रशांत जी शरीर को "अहंकार की पहली कॉलोनी" क्यों कहते हैं? आचार्य जी कहते हैं - अहंकार सबसे पहले शरीर से शुरू होता है। कारण: 1. पहचान: "मैं गोरा हूँ, मैं मोटा हूँ, मैं एथलीट हूँ" - हम सबसे पहले खुद को शरीर से ही डिफाइन करते हैं। 2. तुलना और डर: "लोग क्या कहेंगे अगर मैं मैदान में पसीने से लथपथ दिखी?" "मेरी स्किन काली हो जाएगी"। यही डर लड़कियों को खेल से रोकता है। 3. नियंत्रण: समाज ने स्त्री के शरीर को कंट्रोल करके ही उसे कंट्रोल किया। "इज्जत शरीर में है" कहकर उसकी आज़ादी छीन ली। इसलिए आचार्य जी कहते हैं - जब तक तुम शरीर से चिपके रहोगे, तब तक आज़ाद नहीं हो सकते। खेल, संघर्ष, हार-जीत - ये सब शरीर से परे "मैं" को जानने के रास्ते हैं। तभी विनेश जैसी खिलाड़ी सड़क पर उतरकर कह पाती हैं "मेरा शरीर मेरा है, मेरा सम्मान मेरा है"। सारांश - 2 लाइन में समाज ने स्त्री को "पूज्य देवी" या "आज्ञाकारी पुतली" बनाकर रखा, "इंसान" नहीं बनने दिया। जब तक हम "नाज़ुकता" के झूठ को तोड़कर मैदान, बाज़ार, राजनीति में बराबरी नहीं देंगे, तब तक ओलंपिक में 41 में से 10 पदक ही रहेंगे।


















