Vidya jayandra javirपरिवार में,समाज में,अपनी महत्वाकांक्षाओं में
सबसे पहिले तो मुझे परिवार से बाहर निकलना हैं l
क्या करू मुझे समज मे नहीं आ रहा है l
में ए…
विद्या जी, आपने लिखा कि 8 बजे से 4 बजे तक रुकना पड़ रहा था, समय बहुत जा रहा था, तनख़्वाह भी कम थी, और गाँव से बाहर निकलने के पैसे भी नहीं हैं। यह सारा हिसाब सही है, पर गौर कीजिए कि यही हिसाब अभी भी आपको परिवार के भीतर ही बिठाए हुए है। बाहर निकलने का रास्ता ढूँढते-ढूँढते आप हर बार उन्हीं दीवारों की नाप ले रही हैं जिनसे निकलना है। जो लाश पोस्ट में थी, उसे जो भी भूमिका मिली, उसने वही भूमिका ढो ली। आप अभी वही कर रही हैं, परेशान होकर उसी स्थिति का वज़न बार-बार तोल रही हैं, जबकि असली सवाल पैसे का या समय का नहीं, यह है कि निकलना किस दिशा में है और किसके लिए। यह उलझन अकेले सुलझाने की नहीं है। आचार्य जी के सत्रों की ओर मुड़िए, वहाँ यह साफ़ होगा कि बाहर निकलना किस चीज़ से है, नौकरी से, घर से, या उस डर से जो अभी आपसे हिसाब करा रहा है।


















