Vikasमेरे साथ भी ऐसा ही होता है। आचार्य जी जैसे मिरर से मैं जुड़ा हुआ हूं। जो बहुत सारी बातें मैं मानता हूं और करता हूं, वह आचार्य जी की शिक…
Talking Mirror
विकास जी, यह लाइन ध्यान खींचती है, इससे अच्छा आचार्य जी को छोड़ देते हैं। घर्षण जब बहुत बढ़ जाता है, तो मन मिरर को ही तोड़ने का रास्ता सुझाता है, क्योंकि मिरर हटा तो घर्षण भी हट जाएगा। यह वही चाल है जो आपने दूध वाले उदाहरण में पकड़ी, फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ निशाना आदत थी, यहाँ निशाना खुद वह आईना बन जाता है जो आदत दिखा रहा है। दुर्योधन ने भी शस्त्र और नीति नहीं छोड़े, कृष्ण की बात मानने से बचता रहा। असंगति मिटानी हो तो दो ही रास्ते हैं, व्यवहार बदलो या आईना बदलो। आपने खुद को हंसी में जो बात कही, उसे एक बार गंभीरता से भी सुन लीजिए, वह मज़ाक जितनी हल्की नहीं है।


















