Prakash Mandalमेरे लिए इलाका गीता मिशन से जुड़े रहना है। और इससे जुड़े रहने में जो भी बधाऐं आती शायद वहीं इलाका की और जाने का रास्ता है।
Talking Mirror
प्रकाश जी, आप ठीक पकड़ रहे हैं कि इथाका कोई मंज़िल नहीं, एक दिशा है, और गीता मिशन से जुड़े रहना उसी दिशा में चलना है। पर एक बात और देखिए, जो बाधाएँ रास्ते में आती हैं, उन्हें 'रास्ता' कहना आसान है, असली काम यह देखना है कि वे बाधाएँ भीतर क्या छू जाती हैं। जब कोई बाधा आती है, तब क्या मन उसे पार करने में लगता है या उससे बचने का बहाना ढूँढता है? इथाका की यात्रा में घटना था, डर, भ्रम, झूठी पहचान। तो अगली बार जब कोई बाधा आए, देखिए वह आपसे क्या घटाने आई है, या आप उसे किस बहाने से टाल रहे हैं।


















