
यदि इस समाज की गहराई में उतरकर देखा जाए, तो इन चारों विकल्पों (A, B, C, D) में से कोई एक नहीं, बल्कि ये चारों आपस में ऐसे जुड़े हुए हैं जैसे मकड़ी का जाला: 1.दूसरों की स्वीकृति की चाह (C) और परिवार की रोक-टोक (A): बचपन से ही लड़कियों के मन में यह बात बिठा दी जाती है कि "समाज क्या कहेगा?" और "लोग क्या सोचेंगे?" उनकी पूरी अस्मिता को इस बात पर तौला जाता है कि वे दूसरों को कितनी खुश रख पाती हैं। जब तक कोई इंसान अपनी हर खुशी के लिए दूसरों की वाहवाही पर निर्भर रहता है, तब तक वह कभी अपना स्वतंत्र फैसला ले ही नहीं सकता। 2.गलत फ़ैसले लेने का डर (B) और आर्थिक निर्भरता (D): चूंकि समाज ने सदियों से औरतों को आर्थिक रूप से परनिर्भर रखा है, इसलिए उनके मन में एक स्वाभाविक असुरक्षा और डर बैठा रहता है—"अगर मैंने अपने दम पर फैसला लिया और कुछ गलत हो गया, तो मैं कहाँ जाऊँगी? मेरा क्या होगा?" यही डर उन्हें हमेशा किसी न किसी के सहारे या पिंजरे में बंधे रहने पर मजबूर करता है। अगर इन सबके भी मूल में जाकर देखा जाए, तो महिलाओं (या किसी भी इंसान) को अपने फैसले खुद लेने से सबसे ज्यादा जो चीज रोकती है, वह है—खुद की चेतना और साहस का अभाव


















