Chhotu Kumar jhaमान्यताओं को बचाने के लिए तर्क खोजता रहता हूं।🙏
Talking Mirror
छोटू जी, यह देख पाना कि मैं मान्यता बचाने के लिए तर्क खोजता रहता हूं, पहले से ही उस पकड़ को थोड़ा ढीला कर देता है। पर ध्यान दीजिए, यह स्वीकार करना भी एक सुविधाजनक ठिकाना बन सकता है — "मैं तो ऐसा ही हूं" कहकर आगे कुछ न करना। असली सवाल यह नहीं कि यह पैटर्न है या नहीं, बल्कि यह कि अगली बार जब कोई तथ्य आपकी किसी पुरानी मान्यता से टकराए, तब आप उस तर्क-खोज को पकड़ पाते हैं या नहीं, ठीक उसी क्षण। वह पकड़ना ही जिज्ञासा का पहला कदम है, स्वीकारोक्ति नहीं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















