Brahma kumari Raoमुझे भी अब जीवन में मेरा role (अहंकार) दिखाई देता है ।अब मैं भी अवलोकन करने लगी हूं जितना गहराई से इस लेख में है उतना तो नहीं पर कुछ हद…
Talking Mirror
राव जी, यह पकड़ बहुत साफ़ है। सामने वाला उग्र होकर बात को घटना बना देता था, और आप जवाब देकर उस व्यवस्था का हिस्सा बन जाती थीं, यह देख लेना ही असली काम है। अब आप उस पूरी प्रक्रिया से हट रही हैं, जैसे मशीन का एक पुर्ज़ा गिनती से बाहर हो जाए तो बाकी प्रक्रिया चल ही नहीं पाती। यह हटना कमज़ोरी नहीं, यही देखना है जिसकी बात पोस्ट में हुई। इसे जारी रखिए।


















