
MaNorama Vyas
आचार्य जी से जुड़ने के बाद कहानियों के पात्रों को देखकर अपनी प्रतिक्रियाओं को समझने की कोशिश करती हूँ। किसी पात्र का अपमान या संघर्ष मुझे भीतर तक छूता है, तो उसमें अपनी मान्यताओं, भय और अपेक्षाओं की झलक भी देखने लगी हूँ। अब समझती हूँ कि पात्र के दुख से भावुक होना और उसके माध्यम से स्वयं को पहचानना अलग बातें हैं। कहानी केवल पात्र का जीवन नहीं दिखाती, बल्कि हमारे भीतर छिपे अहंकार, इच्छाओं और धारणाओं को पहचानने का अवसर भी देती है।


















