
हर बात घूम-फिरकर महिला और यौन संबंधों तक ही क्यों पहुँच जाती है? चाहे वह जबरदस्ती किया गया बलात्कार हो, विवाह के भीतर का संबंध हो या समय के साथ बना कोई रिश्ता हर जगह शोषण, चरित्र, वर्जिनिटी, इज़्ज़त, लाज और लज्जा जैसे शब्द सामने आ जाते हैं। लगता है जैसे इन शब्दों की पूरी शब्दावली ही महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हो। लेकिन आखिर क्यों? शोषण हुआ तो सवाल महिला के चरित्र पर क्यों? बलात्कार हुआ तो उसकी इज़्ज़त और लज्जा की बात क्यों, अपराधी की जिम्मेदारी की बात पहले क्यों नहीं? विवाह हुआ तो महिला की पवित्रता और वर्जिनिटी क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है? रिश्ता टूटा तो महिला के चरित्र पर सवाल क्यों उठते हैं? और लाज-लज्जा का बोझ भी बार-बार महिला के हिस्से में ही क्यों आता है? आखिर ये शब्द और सामाजिक मानदंड , आज भी इन्हें इतनी मजबूती से क्यों ढोया जा रहा है? सवाल सिर्फ महिलाओं का नहीं है सवाल यह है उसकी देह और उसके यौन व्यवहार को उसकी पूरी पहचान क्यों बना दिया गया?


















