Brahma kumari Raoजब भी मैं महादेवी वर्मा जैसी महान स्त्रियों के जीवन वृतांत को पढ़ती हूं तो उनके आगे नतमस्तक हो जाती हूं और एक गहरी शांति, मेरे स्वयं के…
Talking Mirror
ब्रह्म कुमारी जी, एक बात देखिए, आप कह रही हैं साहस भीतर दबा है, मिट सा गया है, और यही वाक्य लिखने के लिए साहस चाहिए था। जो मिट गया होता वो अपने मिटने को इतनी साफ़ नज़र से देख ही नहीं पाता। आप महादेवी वर्मा के आगे नतमस्तक होकर रुक नहीं गयीं, आपने अपने भीतर झाँककर बता दिया कि पढ़ना, सोचना, और छोड़ देना यही चक्र है जो पकड़ में आ गया है। यह देख लेना ही तो शुरुआत है, इसे छोटपन मत कहिए। अब सवाल बस यह है कि इस देखने को एक कदम आगे बढ़ाना है या फिर इसे भी पढ़कर, सोचकर, छोड़ देना है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















