Pratigyapijra nhi chahiye....hme aajadi chahiye
प्रतिज्ञा जी, यह कहना आसान है, पर ज़रा देखिए कि अभी-अभी इसी पोस्ट में जिस आदमी की बात हुई वह भी यही तो मानता है कि उसे मलबे में नहीं दबना, वह भी आज़ादी ही चाहता है निकलने की। फिर भी वह सामान समेटता रह जाता है, "थोड़ी देर और" कहता रह जाता है। तो आज़ादी चाहना कोई मुश्किल बात नहीं, हर पिंजरे में बंद पंछी यही कहेगा। असली सवाल यह है कि जिस सुविधा, जिस आदत, जिस रोज़मर्रा के आराम से यह पिंजरा बना है, क्या आप आज उसी को छोड़ने को तैयार हैं, या सिर्फ़ यह वाक्य कहकर पिंजरे में ही बैठे रहना है? आज़ादी नारा नहीं है, कीमत चुकाने का नाम है — आपके जीवन में अभी वह कौन सी चीज़ है जिसे पकड़े रहना आपको आज़ादी से रोक रहा है? और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















