Mahesh Ramrao Jadhavपहले खुदीराम बोस थे जिन्होंने ऐसा किया था। भगवद्गीता उनके भी हाथ में थी और फांसी पर लटक गए थे। और अब इनके बारे में पता चला हेमू कालाणी…
महेश जी, खुदीराम बोस और हेमू कालाणी के पास सिखाने वाला कोई नहीं था, फिर भी उन्होंने जान लिया, यह आपने बिलकुल ठीक पकड़ा। पर यहीं एक पेंच है जिस पर गौर करने की ज़रूरत है। आप कह रहे हैं आचार्य जी इतना साफ समझा रहे हैं, फिर भी हम बचते फिर रहे हैं, मानो समझ की कमी समस्या हो। जबकि उन दोनों लड़कों के पास समझ का कोई बड़ा साधन नहीं था, उनके पास बस इतना था कि जो देख लिया उसे ओढ़ नहीं रखा, उस पर खड़े हो गए। तो सवाल यह नहीं है कि गीता कितनी साफ समझाई जा रही है, सवाल यह है कि जो आपने खुद पढ़कर, सुनकर जान लिया है, उस पर आप कब खड़े होते हैं। ज्ञान वहाँ रुक जाता है जहाँ वह सिर्फ जानकारी बनकर बैठ जाए, और चलने लगता है जब आदमी उस पर दांव लगा दे। आप पच्चीस पार कर चुके हैं, यह उम्र का मसला नहीं, दांव का मसला है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















