Hempal meenaदेख तो पाता हूं पर उसके खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं कर पाता हूं
Talking Mirror
हेमपाल जी, देखने और खड़े होने के बीच जो दूरी आपने अभी नापी, वही असली बात है। देख लेना आसान पड़ गया है, क्योंकि देखने भर से कुछ छूटता नहीं, पहचान बनी रहती है, बस अब वह ज़रा समझदार पहचान बन जाती है जो अपने बारे में सच बोल सकती है। डर उसी पहचान को खोने का है जो खड़े होने पर टूट सकती है। साहस कोई अलग ताकत जुटाने से नहीं आता, वो तो तभी आता है जब वो पहचान पहले से हल्की पड़ चुकी हो जिसे बचाने के लिए चुप रहना पड़ता था। तो अगली बार जब खड़े होने का मौका आए और पैर पीछे खिंचें, वहीं देखिए कि ठीक उस वक़्त कौन सी चीज़ बचाई जा रही है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















