Shivaniनहीं , जब तक वो अपने आप को एक स्त्री की देह ही समझती है । तब तक तो वो कुछ भी ऐसा जो वो कर तो सकती है । पर ये जो हमारे अंदर बचपन से ही ए…
शिवानी जी, आपने खुद लिख दिया कि जब तक वह खुद को स्त्री की देह समझती है, तब तक उसका हर चुनाव उसी देह के बचपन में ढाले गए साँचे से निकलेगा। फिर उसी साँस में लिखा कि वह चुन सकती है, जब अपनी ज़िम्मेदारी खुद ले और किसी और के कंधे पर बंदूक न चलाए। इन दोनों के बीच एक दरवाज़ा है जिसे आपने खोलकर छोड़ दिया। बंदूक कंधे पर तब रखी जाती है जब अपनी आज़ादी का बोझ उठाने की हिम्मत नहीं होती, और परनिर्भरता वही कंधा ढूँढती है। पर यह सिर्फ़ स्त्री की बात नहीं है। "मैं स्त्री हूँ" का साँचा जैसे भीतर से उछल-उछलकर आता है, वैसे ही "मैं पुरुष हूँ, कमाने वाला हूँ, रक्षक हूँ" का साँचा भी उछलता है, और वह भी कंधा ही ढूँढता है। इसलिए मेरा सवाल यह है कि आपके अपने भीतर वह स्त्री भाव आख़िरी बार कब उछलकर आया, और उस वक्त आपने किसका कंधा खोजा? इस सवाल को आचार्य जी के सत्रों में, जहाँ देह वाली पहचान को बिना लाग-लपेट खोला जाता है, साथ लेकर बैठिए।


















