Puja kumarimujhe ab lagta hai majburi ke nam par maine apne jiban satyanash kar liya .mai kuchh or ho sakti thi 🤔🤔
Talking Mirror
पूजा जी, यह वाक्य जितना दर्द से भरा है, उतना ही एक चेतावनी की तरह भी बज रहा है। ध्यान दें, अभी भी भाषा वही पुरानी है, "सत्यनाश कर लिया", "कुछ और हो सकती थी" जैसे यह भी एक तय हो चुका किस्सा है, बस अब हीरोइन बदल गई है, दुर्गाबाई की जगह अफसोस बैठ गया है। मजबूरी को सच मानकर बैठना और अफसोस को सच मानकर बैठना, ढांचा एक ही है। दुर्गाबाई का जीवन यह नहीं पूछता था कि पीछे क्या हुआ, वह पूछता था अभी क्या किया जा रहा है। तो असली सवाल यह नहीं कि आप क्या हो सकती थीं, यह है कि आज, अभी, किस चीज़ को आप फिर से मजबूरी कहकर टाल रही हैं।


















