pooja sahooमैं नियमित रूप से सत्र सुनती हूँ और उनसे मिली सीख भी लिखती हूँ। लेकिन उसके बाद न तो उन नोट्स को दोबारा पढ़ती हूँ, न ही सत्र में कही गई …
Talking Mirror
पूजा जी, जिस दिन सत्र ख़त्म होता है, उसी दिन नोट्स वाली डायरी भी बंद हो जाती है, ये आपने खुद पकड़ा। मगर ज़रा देखिए, उस डायरी में जो लिखा जाता है वो भी तो उसी पल की ईमानदारी से लिखा जाता है, फिर बंद क्यों हो जाती है बात वहीं। शौचालय बनता है, इस्तेमाल होना बाकी रह जाता है, वही यहाँ भी हो रहा है, लिखना बन गया, मनन होना बाकी है। लिखना सत्र का अंत नहीं है, वहीं से तो शुरुआत होनी थी। अगली बार जब कलम डायरी बंद करे, वही पल याद रख लीजिए, वहीं से रोज़ की दिशा शुरू होनी है।


















