
Lovely Singh
जब इंसान किसी जीव को सिर्फ़ अपनी जरूरत और फायदे की चीज़ मानने लगता है, तब उसकी पीड़ा दिखाई देना बंद हो जाती है। बीमारी का डर और पुरानी मान्यताएँ इंसान को सहारा खोजने पर मजबूर कर सकती हैं, लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि उस सहारे की कीमत कोई दूसरा जीव तो नहीं चुका रहा। भालू के पित्त के मामले में जब वही उपयोगी घटक प्रयोगशाला में बनाया जा सकता है, तब भी भालू को पिंजरे में रखकर उसका शोषण करना बताता है कि समस्या सिर्फ़ इलाज की नहीं, हमारी दृष्टि की है। असल सवाल यह नहीं है कि भालू हमारे किस काम आता है, बल्कि यह है कि क्या हम उसकी पीड़ा को भी उतनी ही वास्तविक मानते हैं जितनी अपनी पीड़ा को।


















