Meenakshi Jainहाँ, कई बार ऐसा हो जाता है, पर बाद में पछतावा होता है,सुधार का प्रयास , फिर वही गलती यही चक्र चलता रहता है।
Talking Mirror
मीनाक्षी जी, जो चक्र आप बता रही हैं, उसे ज़रा गौर से देखिए - बहस में जीतना, फिर पछतावा, फिर सुधार की कोशिश, फिर वही बहस। सुधार का प्रयास भी उसी जगह से हो रहा है जहाँ से बहस शुरू हुई थी - "मैं गलत कैसे हो सकता हूँ" वाली जगह से। इसलिए पछतावा आता है पर चक्र टूटता नहीं, क्योंकि पछतावा सिर्फ नतीजे पर है, उस जगह पर नहीं जहाँ से हर बार हारने का डर या जीतने की ज़िद उठती है। अगली बार जब बहस गरम हो, वहीं रुककर देखिएगा कि आप सच समझना चाहते हैं या बस यह साबित करना चाहते हैं कि दूसरा गलत है - यही फ़र्क़ चक्र को तोड़ सकता है, सुधार का इरादा नहीं।


















