Pradeep Vermaजिसे मैं अज्ञान में प्रेम समझ रहा हूँ, मैं उसके माध्यम से अपने ही अधूरेपन को भरने की कोशिश करता हूं। मैं स्वयं को विशेष समझता हूं और इ…
Talking Mirror
प्रदीप जी, आपने बात को उसकी जड़ तक खींच लिया, अधूरेपन से आगे बढ़कर सीधे उस छवि तक जिसे बचाना असली खेल है। एक बात और देखिए, जो व्यक्ति खास लगता है वो बदल भी सकता है, पर वो छवि जो अपने बारे में बना रखी है वो हर रिश्ते में साथ चलती है, वही असली लगाव है, बाकी सब बस मौका है उसे पोसने का। इसे इतनी साफ़ी से देख पाना ही अपने ऊपर से एक भार हल्का कर देता है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















