
Sonam
मैं भी पहले खुद को दुनिया की नजर से देखती थी लेकिन फिर धीरे-धीरे मेरा भ्रम टूटता गया जैसे- जैसे मैंने दुनिया को जाना और आस-पास देखा तो मैंने समझा कि जैसी मैं प्रकृति ने बनाई हूं वैसे ही अच्छी हूं और दुनिया के 99% व्यक्ति अपनी ही नजर में सही नहीं है तो फिर मैं उनकी नजर से खुद को क्यों देखूं आचार्य जी के मिलने से पहले ही मैं खुद को अपनी ही नजर से देखने लगी थी मुझे पहले लगता था कि एक लड़की की शादी हो जाए तो वह पूरी हो जाती है लेकिन मैं गलत थी अब मुझे ऐसा कुछ नहीं लगता क्योंकि जहां तक मैंने सबको देखा है मुझे नहीं लगता की शादी के बाद कोई भी पूरा होता है अब मेरी नजर में एक व्यक्ति का एक सच्चा और आत्मनिर्भर का होना ही पूरा होना है।


















