
समृद्धि जी की बातों से यह समझ आया कि वास्तविक आज़ादी केवल बाहर की नहीं, भीतर की भी होती है। कई बार व्यक्ति आधुनिक कपड़े पहन लेता है, बड़े शहर में रहने लगता है, पढ़-लिख जाता है, पर भीतर डर, सामाजिक दबाव और लोगों की राय की गुलामी बनी रहती है। मुझे सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि "डर को रहने दो, पर जो सही है वह करो।" साहस का अर्थ डर का पूरी तरह समाप्त हो जाना नहीं है, बल्कि डर के रहते हुए भी सही दिशा में कदम बढ़ाना है। गीता का संदेश भी यही है कि हम अपने कर्तव्य और सत्य के अनुसार जिएँ, न कि केवल समाज की स्वीकृति के अनुसार। यदि जीवन का संचालन भय, परंपरा या भीड़ की सोच से होगा, तो हम कभी स्वयं को नहीं जान पाएँगे। पर यदि विवेक के आधार पर निर्णय लेंगे, तो धीरे-धीरे भीतर की गुलामी टूटने लगेगी। आज का अवलोकन यह है कि हम सभी के जीवन में कुछ न कुछ ऐसे डर हैं जो हमें रोकते हैं। लेकिन परिवर्तन की शुरुआत तभी होती है जब हम डर को बहाना बनाना छोड़कर सत्य के पक्ष में खड़े होना शुरू करते हैं।


















