Bhanmati sahuबहुत मुश्किल होता हैं क्योंकि घर_ परिवार,रिश्तेदार और समाज व लोकधर्मिता हमारे अंदर गहराई से बैठी हुई हैं।
अपने जीवन की कोई भी फैसला अपन…
भानमती जी, अपने हिसाब से फैसला लेने पर लोगों की नज़रों में आप मतलबी बन गईं, और जब यही बात बेटी के मुँह से आई तो सबसे ज़्यादा चुभी होगी, यह वज़न साफ़ दिखता है। लेकिन आपने खुद लिखा है कि लोकधर्मिता आपके अंदर गहराई से बैठी है। यानी "मतलबी" का फ़ैसला सिर्फ़ बाहर से नहीं आ रहा, उसकी एक अदालत आपके भीतर भी चल रही है। और उस अदालत के जज भी वही लोग हैं जिनकी राय पर आप अपना फ़ैसला तौल रही हैं। जो नज़र आपको मतलबी कह रही है, वह उसी समाज से उधार ली हुई है जिसे आपके हर फ़ैसले में अपना नुकसान दिखता है। तो असली सवाल यह बनता है कि आपके जो फ़ैसले इतना शोर मचा रहे हैं, उनमें से कौन सा सचमुच अपनी समझ से निकला था और कौन सा बस बाहर की आवाज़ों के विरोध में, यह बारीकी से देखना बाक़ी है। आचार्य जी के सत्रों में ठीक इसी जगह पर बात होती है, जहाँ अपना होना दूसरों की मंज़ूरी पर टिका लगता है। उन्हें सुनना शुरू कीजिए, और जो समझ में आए उसे यहीं लिखते रहिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















