
हम अपनी-अपनी सीमाओं में बंधे हुए हैं। लेकिन जैसे-जैसे समझ बढ़ती है और हम खुद को थोड़ा पीछे रखकर, पूरी तरह सुनने लगते हैं, तब वह बात भीतर असर करने लगती है। फिर एक-एक करके बहुत-सी चीज़ें छूटने लगती हैं। मेरे साथ भी HIDP में ऐसा ही हुआ। मुझे न्यूज़पेपर अवलोकन की activity मिली। ऐसा नहीं है कि मैंने इससे पहले कभी न्यूज़पेपर पढ़ा ही नहीं था, लेकिन इस activity के माध्यम से मुझे समझ आया कि मुझे यह काम करना है, इसे देखना है और इससे सीखना है। इसी तरह मैंने अपने जीवन में भी देखना शुरू किया। मैंने जो मंगलसूत्र पहना हुआ था, उसे उतार दिया। क्योंकि अब मुझे समझ में आ रहा था कि जीवन में जो-जो चीज़ें मुझे भीतर से बाँधकर रखती हैं, उन्हें एक-एक करके देखना और समझना है। यह मैंने किसी के कहने पर या दिखावे के लिए नहीं किया। समझ से किया। शायद यही बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है— पहले देखना, फिर समझना और फिर जो अनावश्यक है, उसे छोड़ देना।






























