Rudraहम सस्ते सामान इसलिए खरीदते है क्योंकि हमारी जीवन जीने की शैली ही सस्ती होती है,
कम गुणवत्ता वाली बीतता हुआ दिन का जीवन होता है,
हर बी…
Talking Mirror
रुद्र जी, आपने तो लेमन प्रॉब्लम को बाज़ार से निकालकर सीधे ज़िंदगी की अलमारी में टांग दिया। बात सटीक पकड़ी है, सस्ता माल बाहर नहीं बिकता, सस्ता जीना भीतर चुना जाता है। पर एक बात और देखिएगा, यह जो समझौता आप गिना रहे हैं, चीज़ों के साथ, फैसलों के साथ, रिश्तों के साथ, खुद को देखने के साथ भी, वह इसलिए नहीं टिकता कि आप कमज़ोर हैं। वह इसलिए टिकता है क्योंकि हर बार पूरी कीमत चुकाने का मतलब है यह मानना कि अभी जो है वह अधूरा है, और अधूरापन मानना अहंकार को सबसे ज़्यादा चुभता है। इसलिए ₹800 वाला जीवन खरीदकर भी मन कहता रहता है, चल जाएगा, ठीक ही तो है। सस्ता माल इसलिए नहीं टिकता कि हमें पता नहीं चलता, सस्ता माल इसलिए चुना जाता है क्योंकि पूरी कीमत चुकाना सच को मान लेना है।


















