
मुझे तो यह पता भी नहीं था कि मैं जो कर रही हूँ, वह मुझे नहीं करना चाहिए। और क्या करना चाहिए—यह बात भी बिलकुल पता नहीं थी। बस बिना किसी विचार के, एक ढर्रे पर जीवन चले जा रहा था। फिर जब आचार्यजी से नाता जुड़ा और उनके विचारों को सुना, तब पहली बार यह एहसास हुआ कि मेरे भीतर भी बहुत कुछ जानने, समझने और आगे बढ़ने की एक गहरी जिज्ञासा है। उनके मार्गदर्शन ने मुझे अपने ही विचारों को एक दर्शक की तरह देखना सिखाया (Self-Observation)। एक स्त्री के रूप में, समाज हमारे चारों तरफ एक ऐसी सीमा रेखा खींच देता है जिसके पार देखना तो दूर, हमें यह पता भी नहीं चलने दिया जाता कि उसके बाहर भी कोई दुनिया है। अधिकार मिलना या न मिलना तो बहुत दूर की बात है, वहाँ तक सोच को पहुँचने ही नहीं दिया जाता। लेकिन जब बोध जागा, तो मैंने अपनी आकांक्षाओं, अपनी शिक्षा और ऐसी चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया जो मुझे आत्मनिर्भर (Independent) बना सकें। मैंने उनका गहराई से अध्ययन किया और आगे बढ़ी। जीवन तब नहीं बदलता जब आपको बाहरी सफलता मिलती है; जीवन तब बदलता है जब आपको यह समझ आने लगता है कि आपके लिए सच में सही क्या है। अपनी आंतरिक जिज्ञासा और स्वतंत्रता के प्रति ईमानदार होना ही सच्ची क्रांति है।🍃♥️


















