Vinitaकिसी भी जीव के दर्द को सच में देख पाना हमारी संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है, क्योंकि जब हम दूसरे जीव की पीड़ा को महसूस करने लगते हैं,…
विनीता जी, आपने लिखा कि दर्द को देखना अपने ही विवेक पर प्रश्न खड़ा कर देता है। यानी अनदेखा करने का काम आँख बंद करके नहीं होता, पहले देख लिया जाता है, और फिर उसी देखे हुए को "वस्तु" का नाम देकर खुद से छिपा लिया जाता है। जिस चीज़ का नाम बदलना पड़ता है, उसका वज़न पहले से पता होता है। आपने अपनी बात में "हम" और "वह" के बीच "इंसान हो या मछली" जोड़ा है। इसमें एक और बात खुलती है: जिस नज़र से थाली में रखी मछली "उत्पाद" बनती है, वही नज़र किसी इंसान को भी "काम की चीज़" बना देती है। तो सवाल सिर्फ़ मछली का नहीं रहता, अपनी नज़र का है, जो हर रिश्ते में चुपचाप यही हिसाब लगाती रहती है कि सामने वाला किस काम का है। आपके अपने रिश्तों में यह हिसाब कहाँ-कहाँ बैठा है? और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















