
Raj Kumar
हां, ऐसा ही होता है। जब कोई व्यक्ति समाज के लिए कार्य कर रहा होता है तो उसके पीछे उसकी एक चाहना बन जाती है कि मैं अगर ऐसा करूंगा तो मुझे यह मिल जाएगा। जब व्यक्ति उस चाहना के पीछे चलता है तो वहां उस अहंकार की जद में आकर के फंस जाता है। जब वह व्यक्ति उस अहंकार की जद में आकर के फंस जाता है तो फिर वह वही कार्य करता है जो गलत होता है जिसमें स्वार्थ, लालच, मोह जो सारी की सारी अहंकार की ही भावना है। लेकिन जब किसी इंसान का दृष्टा भाव जागृत होता है तो उसके साथ यह नहीं होता, उसके साथ तो एक ज्वाला प्रकट होती है जो सत्य के लिए होती है। जहां किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं होता है जो केवल शक्ति भाव से इस प्रकृति को सत्यता के साथ अपने आप को खपा देता है।


















