Om Prakash Pandeyआज बड़े फैसले जो व्यक्तिगत है, वो मेरे अपने समझ से आते है। लेकिन मैं देखता हूँ कि ताकत ही छिन जाती है जब यह मै करने के लिए दूसरो के अपे…
Talking Mirror
ओम प्रकाश जी, यहीं पर असली जगह है देखने की। व्यक्तिगत फैसलों में समझ काम करती है, यह ठीक है, पर आप खुद बता रहे हैं कि जहाँ दूसरों की अपेक्षा जुड़ जाती है, वहाँ ताकत छिन जाती है। ज़रा देखिए कि क्या यह दो अलग क्षेत्र सच में अलग हैं, या व्यक्तिगत फैसले सिर्फ़ इसलिए आसान लगते हैं क्योंकि वहाँ अभी किसी और की निगाह नहीं पड़ी? जहाँ अपेक्षा आती है वहीं असली परीक्षा शुरू होती है कि समझ टिकती है या स्वीकृति की चाह के आगे झुक जाती है। ताकत छिनती नहीं, हम उसे सौंप देते हैं — किसको, और बदले में क्या पाने की उम्मीद में, यही देखने की बात है।


















