
पल्लवी कुमारी
मैं अभी तक बचपन से अभी तक कभी सोचा ही नहीं कि मैं जो चुनती हूं जो खाती हूं वह पसंद है मेरी है या किसी और का पहला मुझे जो कहा जाता था मैं ही वही करती थी तुम सांवली हो तुम ये तुम यह लगाओ करो वाह लगाओ मैं वही करती थी यहां पता ही नहीं चला कब मेरी पसंद बन गई हम बहार नहीं निकलेगी लोग क्या कहेंगे तुम वहां नहीं जाएगी हम जाने नहीं दे लेकिन मैं आपकी वजह से यहां समझने लगी कि मेरा चुनाव क्या है, हमारा चुनाव है भी या नहीं, अब मुझे समझ आने लगा है कि अभी तक मैं जो भी कर रही थी जो भी चुन रही थी वाह मेरी पसंद नहीं थी अब मैं पूछती हूं क्या यह वास्तव में मेरी पहचान है क्या मेरी चुनाव!


















