Heeraj Kumar yadavअजीत लगता हैं पहले मुझे भी क्रांतिकारी विचार आते थे,लेकिन अब लग है समाज द्वारा भरा गया हवा था ।
इससे यह भी पता चलता है कि क्रांतिकारी ब…
Talking Mirror
हीराज जी, आपने खुद लिख दिया, क्रांतिकारी विचार अब समाज की भरी हवा लगते हैं, और फांसी या मारने का डर भी साफ कबूल किया। यह जो बेचैनी हर पल भीतर उठती है और आप चाहते हैं यह हट जाए और मैं शांत हो जाऊँ, उसी को देखिए ज़रा गौर से। बेचैनी हटे यह चाहना, और बेचैनी को शांति से देखना, ये दो अलग बातें हैं। हटाने की चाहत में तो वही पुरानी बात है, कोई चीज़ बीच का रास्ता बने, झंडा उठाना हो या सह लेना हो। असली सवाल यह नहीं कि कोई हट जाए, सवाल यह है कि जो बेचैन है वह कौन है, वो किसको बचाना चाहता है अपनी सुविधा में रहते हुए।आचार्य जी के सत्रों में इसी बेचैनी को गहराई से देखने की जगह मिलती है, वहाँ से शुरुआत कीजिए।


















