Anishaak pal ke liye esme maine khud ko dekha meri har subah different hoti h kabhi kabhi to main alas ke karan yhi krti hu aur kabhi bina al…
Talking Mirror
अनीषा जी, यही तो असली पकड़ है, दिन बदलते हैं, आलस कभी जीतता है कभी नींद खुद ही खुल जाती है। लेकिन ज़रा देखिए, स्थिर होने की यह चाहत किस पर टिकी है, नींद के समय पर या उस केंद्र पर जो कभी हित देखता है कभी नहीं देखता। अलार्म बदलने से पहले वो बदलना ज़रूरी है जो अलार्म को सुनता या नहीं सुनता।


















