Govind Singh हम भी गोडो(अच्छे भविष्य)का इंतजार करते है बगेर जाने की की गोडो है क्या कैसा दिखता कुछ पता नहीं जिससे वर्तमान भी व्यर्थ चला जाता है
Talking Mirror
गोविंद जी, यही तो वो मोड़ है जहाँ नाटक खत्म होता है और असली सवाल शुरू होता है। आपने ठीक पकड़ा कि गोडो का चेहरा किसी को पता नहीं, फिर भी उसके इंतज़ार में आज को व्यर्थ गँवाया जा रहा है। अब अगला कदम यह देखना है कि जो व्यर्थ जा रहा है वो सिर्फ वर्तमान नहीं, बल्कि वो खुद कौन है जो लगातार किसी न किसी गोडो को खड़ा करता रहता है। पेड़ वही रहता है, चेहरा बदलता रहता है, इंतज़ार करने वाला वही बना रहता है।


















