Sonamअगर बहस में बात सच की है तो मैं अपनी बात को सही साबित करने की बजाय सच को जानना ज्यादा जरूरी मानूंगी।
Talking Mirror
सोनम जी, यह बात कहनी आसान है, और असली इम्तिहान तब आता है जब बहस आपके किसी करीबी विश्वास पर ही लग जाए। उस वक़्त देखिएगा कि भीतर क्या होता है - क्या वाकई सच जानने की तत्परता बनी रहती है, या अचानक अपनी बात बचाने का कोई तरीका ढूँढने लगते हैं। जब तक अपनी मान्यता को चोट नहीं लगती, तब तक यह कहना कि 'मुझे सच चाहिए' सस्ता है। अगली बार जब कोई आपकी बात को काटे, पहले यह देखिएगा कि भीतर पहली हलचल क्या उठी - सुनने की, या जवाब तैयार करने की।


















